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रजनी के पिता रेहड़ी लगाते व मां करती है मजदूरी, बेेटी बनी मैरीकॉम नंबर 2
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रजनी के पिता रेहड़ी लगाते व मां करती है मजदूरी, बेेटी बनी मैरीकॉम नंबर 2

पानीपत, न्यूज़ एजेंसी | अगर मन में कुछ करने की तम्मना हो तो गरीबी आड़े नहीं आ सकती | कहने का तात्पर्य यह है की अगर आपके दिल में आग लगी हो तो दुनिया की कोई भी मजबूरी कोई विवश नहीं कर सकती | में ये कहानी उस मेरीकॉम की बता रहा हु जो ३० साल पहले मणिपुर की थी जिसने एक इतिहास रचा था | लेकिन जो दूसरी मेरीकॉम है उसका नाम मेरीकॉम २ है जो हरियाँ से है |

लेकिन उन दोनों कई चीजे में समानता पाई जा रही है जैसे- पृष्ठभूमि वही, किरदार भी वही हू-ब-हू |यह सच्चाई पानीपत के बवाना गांव की है | पानीपत के बुआना लाखू में ‘मैरी कॉम-2’ का ‘ट्रेलर’ रिलीज हो चुका है। ट्रेलर बता रहा है कि ‘फिल्म’ सुपर हिट होगी।

हम बात कर रहे हैं मैरीकॉम नंबर 2 के रूप में उभर रही पानीपत के बुआना लाखू की रजनी कश्‍यप की। रजनी के पिता रेहड़ी लगाते हैं और मां मजदूरी करती हैं। रजनी खुद भी मजदूरी करने को मजबूर है, लेकिन हौसले से आसमान छूने की ओर अग्रसर है।

पानीपत के बुआना लाखू में रिलीज हुआ मैरी कॉम-2 का ‘ट्रेलर’

छह बार विश्व मुक्केबाजी का खिताब जीतने वाली एमसी मैरी कॉम की प्रारंभिक जीवन संघर्ष से भरी पड़ी है । रजनी अपनी मां-बाप के साथ खेतों में काम किया करती थीं। लेकिन उसके अंदर मुक्केबाजी का जुनून जो था। उसके जुनून संघर्षों पर भारी पड़ा, जूनून उसके संघर्ष के आड़े नहीं आई । और फिर जो हुआ, दुनिया ने अपनी खुली आँखों से देखा। मेरी काम नाम की फिल्म बॉलीवुड ने भी बनाकर सबको मेरीकॉम का जज्बा और उसकी कठिन म्हणत और परिश्रम दुनिया को दिखाया |

अब ऐसी ही दूसरी मेरीकॉम हरियाणा के पानीपत के एक छोटा सा गांव बुआना लाखू में है , जिनका नाम है रजनी कश्यप।

खेतो में मजदूरी करने वाली हरियाणा की बेटी बनी बॉक्सिंग स्टार किंग

16 साल की रजनी कश्यप ने विश्व मुक्केबाजी का उभरता हुआ सितारा हैं। हाल ही में उसने सर्बिया में हुई नेशंस जूनियर चैंपियनशिप में पदक जीतकर उसने अपने नाम की। उसने अब तक के पांच अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय खिताब उसके नाम दर्ज हो चुके हैं।

रजनी एक गरीब परिवार से सम्बन्ध रखती है , उसके पिता रेहड़ी लगाते हैं, सब्जी बेचते है तथा कभी लस्सी बेचते हैं, तो कभी कुछ और उनकी मां खेतों में मजदूरी करती है। कभी-कभी रजनी भी मां के साथ मजदूरी करती है।

१६ साल की रजनी कश्यप बॉक्सिंग के अभ्यास के साथ-साथ मां ऊषा कश्यप के साथ खेतों में मजदूरी भी करती है

11 से 18 दिसंबर को चंडीगढ़ में संपन्न हुई जूनियर बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रजनी ने 46 किलोग्राम में स्वर्ण पदक जीता है। जानकर बताते हैं की , पांच साल पहले जब रजनी ने बॉक्सिंग कोच सुरेंद्र कुमार की गांव की एकेडमी के बॉक्सरों ने जब राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में पदक जीते तो ग्रामीणों ने उन्हें नोटों की माला पहना सम्मान दिया था | तभी रजनी ने यह प्राण लिया था कि मैं पदक जित कर ही डैम लुंगी और देश का गौरव बनूँगी | और तब मुझे भी लोग नोटों की माला पहनाएंगे…।

हालांकि यह देखा जय तो ये राह इतना आसान नहीं थी। पिता जसमेर और मां ऊषा उसके इस अरमान को पूरा नहीं कर सकते थे। दोनों की कमाई से पांच बहनों और भाई की परवरिश मुश्किल से हो पाती है। फिर भी उसकी माँ रजनी कश्यप ने उसे बॉक्सिंग सिखने की इजाजत दे दी थी |

रजनी ने खुद अपने माँ और पिताजी से कहा – मुझे कुछ नहीं चाहिए लेकिन मुझे मेरी इच्छा को पूरी करने में मेरी मदद कीजिये | और उसके माँ और पिता ने है भरी और उसे इस काम के लिए इजाजत दे दी |
रजनी ने भी हर रोज पांच से छह घंटे लगातार अभ्यास जारी रखा | साथ ही मां के साथ भी खेतों में मजदूरी भी करने जाती। और अब भी कभी कभी जाती है |

पिता जसमेर बताते हैं, रजनी बचपन से निडर प्रवृत्ति की लड़की थी। वह कभी-कभी सहेलियों व बहनों की भी पिटाई तक कर देती थी। और जब उसने मुक्केबाजी सिखने की इच्छा जाहिर की थी तभी मुझे कुछ-कुछ समझ में आ गया था कि ये लड़की जरूर कुछ कर के दिखाएगी। लोगों ने कई तरह-तरह की बातें बनाये कुछ लोग कहते थे की लड़की का चेहरा बिगड़ जाएगा, फिर कौन लड़का इससे शादी करेगा और शादी में भी बहुत दिक्कत होगी। पर रजनी ने कोई भी अफवाहों पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया ।

पदक के साथ रजनी।

जसमेर कश्यप कहते हैं, मैंने भी कभी इनको नहीं रोका। साथ ही साथ उसने पढ़ाई भी जारी रखी। दसवीं प्रथम श्रेणी में पास की और बॉक्सिंग में पदक भी जीते। मुझे अपनी बेटी पर गर्व है। कोच सुरेंद्र कुमार बताते हैं, वह सुबह शाम तीन-तीन घंटे और प्रतियोगिता नजदीक होने पर अतिरिक्त दो घंटे अभ्यास करती है।

सर्बिया में वह बेस्ट बॉक्सर चुनी गई। फ़िलहाल अब वो खेलो इंडिया के नेशनल कैंप में है। हमें उससे मैरी कॉम जैसी बड़ी उम्मीदें हैं।

आसान नहीं मैरी कॉम बनना…:

खेतों में मजदूरी का काम करते हुए जिसका बचपन बीता, लेकिन अदम्य साहस और जूनून, जज्बे के बलपर उसने ये इतिहास रचा। मणिपुर के एक बेहद गरीब परिवार में 1 मार्च 1983 को जन्मी एमसी मैरी कॉम को दुनिया ने सलाम किया। रिकॉर्ड छह बार विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियन बनी। फिल्मी पर्दे पर प्रियंका चोपड़ा ने उनकी जिंदगी को बखूबी जिया। 2006 में मैरी कॉम को पद्मश्री और 2009 में राजीव गांधी खेल रत्न से नवाजा गया।

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