छठ पुजा का महत्व एवं आधारित धार्मिक पौराणिक प्रचलित कथाएँ

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Chhath Puja 2022: छठ पुजा हिन्दुओ का आस्था और विश्वास का त्योहार है । यह त्योहार प्राचीन समय से ही चला आ रहा है । भारत भर मे ये पर्व मुख्यत: झारखंड, बिहार, ओडिसा तथा पुर्वी उत्तरप्रदेश तथा नेपाल के कुछ भागों मे मनाया जाता है । लेकिन अब ये पर्व इतना प्रचलित हो गया है, विश्व के कई भागों मे भी मनाया जाता है । इस पर्व में पुजा होती है, लेकिन मुर्ति का नही। इस पुजा में भगवान सुर्य और उसकी पत्नी उषा को उषावेला और प्रात: को अर्ध्य दिया जाता है।

छठ पुजा का महत्व

छठ पुजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है या फ़िर दिवाली के छठे दिन से शुरु हो जाता है । छठ पुजा, छठ माता और सुर्य भगवान की पुजा करते है और ये दोनो भाई-बहन है । छठ पुजा स्त्री तथा दोनो मिलकर मनाते है लेकिन बिना अन्न-जल लिए (निर्जला ) छठ माता भक्तों के सर्वमनोकामना पुर्ण करने वाली मां है ।

छठ पुजा का महत्व एवं आधारित धार्मिक पौराणिक प्रचलित कथाएँ

2022 में छठ पूजा की तिथि इस प्रकार है :-

शुक्रवार 28 अक्टूबर :   नहाय-खाए

शनिवार 29 अक्टूबर :  खरना (लोहंडा)

रविवार 30 अक्टूबर  : सायंकालीन अर्घ्य

सोमवार 31 अक्टूबर : प्रात:कालीन अर्घ्य

छठ पूजा के अन्य नाम

  • छठी माई की पूजा,
  • डाला छठ,
  • सूर्य सस्थी,
  • डाला पूजा
  • छठ पर्व

छठ पूजा बर्ष में दो बार मनाया जाता है, एक बार चैत्र मास में जिसे साहित्य छठ तथा दूसरी कार्तिक महीने में जिसे कार्तिकी छठ कहा जाता है |

छठ पूजा को किस प्रकार मनाया जाता है

यह पर्व लगातार चार दिन चलने वाला सूर्य-उपासना का यह पर्व है | इस पर्व में व्रती लगातार 36 घंटे तक व्रत विना अन्न -जल ग्रहण किये उपवास करते है |

नहाय खाय : छठ पूजा नहाय खाय से शुरू होता है जो कार्तिक माह के चतुर्थी तिथि को आता है, इस दिन पवित्र मन से पुरे घर-आँगन तथा गली- गलियारे की पूरी साफ सफाई किया जाता है , क्योकि उनका ऐसा मानना है की छठ माता रथ पर सवार होकर गुजरेगी | फिर व्रती स्नान आदि निर्वित होकर पवित्र वास्ता धारण करने के बाद , पवित्र रसोई से बना शुद्ध -शाकाहारी भोजन ग्रहण करते है| तत्पश्चात उसके घर के सभी सदस्य भोजन करते है |

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लोहंडा तथा खरना :- नहाय खाय के अगले दिन खरना आता है। कार्तिक शुक्ल पक्षी के पांचवे दिन को खरना कहते है , इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते है और शाम को भोजन करते है | इस प्रसाद की बहुत महत्त्व है, जिसे लेने के लिए आस-पास के सारे लोग जमा होते है | ये प्रसाद घी और दूध और अरवा चावल से बनाया जाता है, जिसमे नमक और चिन्नी नहीं उपयोग होता है, गुड़ का उपयोग होता है | और इसे पवित्र वातावरण में पवित्र मिटटी के बर्तन में बनाई जाती है। यही इस पर्व की khash महत्व है। साफ सफाई का बहुत ही अत्यधिक महत्व है।

संध्या अर्घ्य :- खरना पूजा के अगले दिन खष्टी तिथि को संध्या वेला में प्रथम अस्ताचल अरग पड़ता ह। अस्ताचलगामी भगवान् आदित्य को अरग देकर उनका आशीर्वाद लेते है। और प्रसाद के रूप में चावल और गुड़ मिक्स करके का लड्डू बनाते है साथ में कुछ फल जैसे -कैला, नारियल या सेव होते है, पुवा भी हो सकता है | जिसे एक बांस के बने सुप या अगरबत्ती आदि सब एक में सजाकर व्रती सपरिवार अस्ताचल भगवन को अर्घ्य देने के लिए कोई पवित्र तालाब या नदी के किनारे जाकर पानी में स्नान करके पानी में ही खड़ा होकर भगवन का अस्ताचल में जाने का इंतजार करते है और ज्योही सूर्य भगवान चक पर बैठ जाते है व्रती भगवान का ध्यान करके उनको अर्पित करते है | ऐसा करके वे अपने आप को धन्य मानते है। चारो और का वातावरण शाम के समय जैसे लगता है की बहुत बड़ी मेला लगा हो |

उषा अर्घ्य या पारण : सप्तमी तिथि को फिर से व्रती सपरिवार सुबह बेला में तालाब या नदी के किनारे पहुंचकर सुप में सभी सजाकर वही जहा शाम को अर्घ्य भगवान को दिया था वही जाकर स्नान करके पानी में ही खड़ा होकर भगवान जब रथ में बैठकर उदय होते है फिर उनको ध्यान करते है और अपना पूजा का समापन करते है | फिर घर आकर छठी मैया की पूजा करके प्रसाद का वितरण करते है | और छठ माता से भूल-चूक के लिए माफ़ी मांगते है | और इस प्रकार छठ पूजा संपन्न होता है |

छठ पूजा पर आधारित पौराणिक कथाए (Mythology based on Chhath Puja)

एक कथा के अनुसार रामायण में जब भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने राक्षसराज लंकापति रावण को मारकर चौदह बर्ष का वनवास बिताकार भार्या और अनुज लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे थे, तब अपने रामराज्य के स्थापना के लिए कार्तिक शुकल पक्ष को भगवान राम और माता जानकी ने ये विधिवत व्रत रखकर भगवान सूर्य से आशीर्वाद प्राप्त किया था |

एक दूसरी कथा महाभारत महाकाव्य के अनुसार जब पांचो पांडव ने धूर्त क्रीड़ा में अपना सर्वस्य हर चुके थे तब पांचाली द्रोपदी ने छठ पूजा की थी , तब सूर्य भगवान की कृपा से सब राजपाट पुनः प्राप्त हो गया था |

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महाभारत में ही कर्ण एक वीर योद्धा था , वे सूर्य भगवान के परम भक्त थे | वह रोज घंटो रोज कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य भगवान की पूजा करते थे | इसलिए वे एक वीर-योद्धा थे |

पुराणों के अनुसार राजा प्रियवद और उनकी पत्नी मालिनी को कोई संतान नहीं था | उनके गुरु महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया और यज्ञाहुति के खीर को मालिनी को दिया जिससे उसे पुत्र की प्राप्ति हुई | पूण: भगवान की कृपा से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन मृत निकला | फिर राजा प्रियवद ने पुत्र वियोग में अपना प्राण त्यागने लगे |

उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और उन्होंने कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

छठ पूजा का फल

छठ पूजा लगातार करते रहने से आपके घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है, अगर आप निपूती है तो पुत्र की प्राप्ति होती है | निसंतान दम्पति को पुत्र-रत्न की प्राप्ति होती है |

छठ पूजा के नियम या नहीं करना चाहिए:

  • यह पर्व कठिन तपस्या जैसा ही है क्योकि आपको 36 घंटे बिना अन्न-जल लिए उपवास करना होता है .
  • अगर यह पर्व स्त्री करे तो परवतनी तथा पुरुष को पर्वेता कहते है.
  • इस पर्व में आप खाट या पलंग पर नहीं सो सकते है आपको धरती पर सादगी के साथ सोना पड़ेगा यानि सुख सेय्या का त्याग करना होगा.
  • व्रती ऐसे कपडे पहनते है जिसमे सिलाई नहीं हो इसमें महिलाये साड़ी और पुरुष धोती पहन सकते है लेकिन ध्यान रहे सिलाई नहीं हो.
  • छठ पर्व शुरू करने के बाद आपको हर साल करना पड़ेगा जबतक कोई दूसरा विवाहित जोड़ा इसके लिए तैयार न हो.
  • घर में अगर किसी की मृत्यु हो जय तो यह पर्व उस साल नहीं कर सकते है .
  • यह सर्व मनोकामना वाली पर्व है अगर आप पूरी मन से करते है आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी .

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