Andher Nagri Chaupat Raja- अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा

Andher Nagri Chaupat Raja- अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा

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Andher nagri chaupat raja short story in Hindi

नमस्कार दोस्तों , मेरे इस वेबसाइट पर आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद

आप सबने आम का पेड़ प्रेरणादायक कहानी पढ़ी ही होगी उसपर हमने एक यूट्यूब वीडियो बनाकर चैनल पर अपलोड किया देख लीजियेगा . इन कहानियों के पढ़ने से हमारे शरीर के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार होता है . हम अपने जिंदगी में अपने आप को अलग थलग पते है और हर कोई नेगेटिव बना देता है हमारे अंदर की हवा को पिन लगाकर बहार निकल देता है और जब हमारे अंदर कोई जोश नहीं होगा वो हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा .

इसलिए आपके अंदर जोश भरने का काम इन कहानियों के द्वारा होता है . दोस्तों में आप सभी के लिए एक से बढ़कर एक motivational inspiration स्टोरी लेकर आता रहूँगा , केवल आप लोग मेरा हौसला बढ़ाते रहिएगा . आप सभी मेरे चैंनले को कृपया करके subscribe कर दीजियेगा ये मेरा हक़ है और अधिकार भी , तभी तो में motivate रहूँगा .

अंधेर नगरी चौपट राजा [ Andher Nagri Chaupat Raja] एक प्रेरणादायक कहानी है यह लघु कहानी अक्सर विद्यार्थियों को भी हिंदी भाषी परीक्षा में लिखने को दिया जाता है. इस महाकाव्य के रचयिता भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी है , जिन्होंने अपने लेखनी के द्वारा लोगों के सामने एक मिशाल के रूप पेश किया है . उनके विचार कितने उत्तम थे , जिन्होंने समाज या देश में इस तरह के समाज का आँखों देखी हाल का हु-बहु चित्रण किया है .

इस समाज में सभी वस्तुए टके सेर यानि एक रूपये के भाव में मिलते थे और यहाँ का राजा भी चौपट था , उनकी शासन व्यवस्था भी उसी प्रकार था .

इसलिए हम सभी इस प्रेरणादायक कहानी से एक अच्छी सी सीख लेनी चाहिए . चौपट राजा का न्याय व्यवस्था से हमें बहुत कुछ सीख लेनी चाहिए . तो हम आगे बढ़ते हुए कहानी पर आता हूँ .

Andher Nagri Chaupat Raja story summary

एक समय की बात है कोशी नदी के किनारे एक संत अपने शिष्य गंगाधर के साथ कुटिया बनाकर रहते थे. वे दोनों परम ज्ञानी, विद्वान् और ईश्वर के सच्चे भक्त थे. ये दोनों अपने अधिकांश समय अपने तपस्या तथा भगवान् की भक्ति में लगाते थे . और भिक्षाटन करके अपनी आजीविका चलते थे .

वे कभी- कभी देश-भ्रमण करके जनता की सेवा भी कर लिया करते थे . इसी दरम्यान देश-भ्रमण के दौरान वे विचित्र देश में पहुंचे . वहां भी इन दोनों गुरु और शिष्य ने नगर के बाहर एक बगीचे में अपना डेरा डाला  और नगर के हाल-चाल लेने के लिए निकल पड़े .

दिन-भर दोनों गुरु और शिष्य देश में भ्रमण करने के बाद शाम को कुटिया में पधारे . दिन-भर घूमने के बाद गुरु को भूख का अहसास हुआ . उन्होंने अपने शिष्य को एक रुपया देकर कहा की बाजार जाकर कोई भाजी [ सब्जी] ले आओ .  जब उनका शिष्य बाजार गया तो एक बनिया उससे मिला तो उन्होंने बाजार की सभी वस्तुओं का भाव पूछा . उस बनिए ने उस शिष्य को सभी वस्तुओं का भाव टके सेर यानि एक रूपये के किलो बताया . उसने बोलै कमाल है सभी वस्तुओं का भाव टके सेर है .

शिष्य – इस नगर का क्या नाम है

बनिया – अंधेर नगरी

शिष्य – इस नगर के राजा का क्या नाम है

बनिया – चौपट राजा

उसके शिष्य के मन में सभी वस्तुओं के भाव को जानकर आश्चर्य हुई की ये कैसा नगर है यहाँ सभी वस्तुए एक ही भाव में मिलते है, भाजी, मिठाई, दूध, दही, मक्खन आदि .

अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा- Andher Nagri Chaupat Raja

फिर उस शिष्य ने सोचा की हमलोग रोटी और भाजी को तो रोज खाते ही है क्यों न आज हम मिठाई का आनंद लिया जय और उसने अच्छा सा मिठाई देखकर एक टके के एक सेर लेकर आ गया . जब उसके गुरु ने देखा की गंगाधर ने भाजी के बदले मिठाई लेकर आया है तो उस के मन में शंका हुई .

फिर गंगाधर ने अपने गुरु को पूरी बात विस्तार से बताई . फिर गुरु जी ने उसे बताया की बेटा यह नगर अंधेर नगरी है और यहाँ का राजा चौपट राजा है यानि जो महामूर्ख है . हमें जितना जल्दी हो सके इस नगर का त्याग कर देना चाहिए , नहीं तो कभी भी यहाँ पर प्राणो का संकट आ सकता है .

लेकिन गुरु के इस बात पर शिष्य सहमत नहीं थे और उसने कहा कि अगर आपकी आज्ञा हो तो में कुछ दिन और रहकर मिठाई का आनंद ले सकूँ . इस बात को सुनकर गुरु जे हँसते हुए जवाब दिया और कहा ठीक है बेटा जैसी तुम्हारी मर्जी . तुम चाहो और कुछ दिन रहकर मिठाई खाकर अपना सेहत और बना लो लेकिन जब कभी कोई संकट तुम्हारे ऊपर आएगा तो मुझे जरूर याद कर लेना . फिर गुरूजी उस स्थान से चले गए .

अब गंगाधर रोज-रोज भिक्षाटन को जाता और शाम तक एक टका उसे भिक्षा में मिल जाता जिससे वह रोज एक सेर मिठाई लाता और खूब आनंद से खाता, इस प्रकार कई महीने निकल गए लेकिन वह कुछ ही दिनों में मोटा -ताजा हो गया .

Andher Nagri Chaupat Raja quotes

इसी बीच उस नगर में घटना घट गया . एक दिन एक गरीब विधवा कलावती कि बकरी ने दिलदायल के फसल को चर रही थी . जिसे देखकर दीनदयाल को बकरी पर गुस्सा आ गया और उसने एक डंडे से दे मारा . संजोगवश वह बकरी मर गई . अब वो कलावती अगले दिन राजा दे दरबार में न्याय के लिए पहुंच गई .

राजा ने सारी बात सुनने के बाद ये हुकुम दिया कि मौत के बदले मौत कि आज्ञा दी  और कहा कि दीनदयाल को फांसी पर लटका दो . अगले दिन कोतवाल ने उसे पकड़कर राजा के सामने पेश किया तो राजा ने उसे हुक्म दिया को बकरी को जिन्दा करा दो अन्यथा फांसी पर चढ़ो . बकरी को जिन्दा करना उसके वश कि बात नहीं थी सो अब उसे जल्लाद ने फांसी पर लटकने लगे.

दीनदयाल बहुत दुबला पतला था इसलिए फांसी का फंदा उसके गले में बराबर से फिट नहीं बैठ रहा था . तो जल्लाद ने राजा से निवेदन किया कि महाराज फांसी का फंदा इसके गले से बराबर नहीं फिर बैठ रहा है . तो पहले राजा ने कुछ सोच विचार किया फिर बोला कि जिसके गले में फांसी का फंदा ठीक बैठेगा उसे पकड़कर मेरे सामने हाजिर करो .

इतना सुनते ही कोतवाल और जल्लाद पुरे नगर में फ़ैल गए और योग्य व्यक्ति को ढूंढने लगे . अचानक उसी समय नगर के बाहर गंगाधर अपने कुटिया के बहार दंड बैठक में लीन था . जिसे देखकर जल्लाद ने कहा कि ए.बी.ए. हमारी खोज पूरी हुई लो अब हमारा शिकार मिल गया . कोतवाल ने उस पकड़कर राजा के सामने पेश किया .

गंगाधन ने कहा कि हमारी क्या गलती है जो मुझे फांसी देने वाले हो. तब राजा ने कहा कि तुम्हारी गलती बस इतनी है कि तुम्हारा गला फांसी के फंदे बराबर बैठ रहा है .

Moral of andher nagari chaupat raja story

तब गंगाधर को अचानक गुरु कि बात याद आई कि संकट के वक्त मुझे याद कर लेना . उसने तुरंत अपने गुरु को याद किया . गुरूजी तुरंत प्रकट हो गए और पूरी स्थिति को समझते उसे देर न लगी . गंगाधर ने बोला कि भगवन मेरी रक्षा करो तो गुरूजी ने बोला कि बेटा मेने तुमको पहले ही बोला था ऐसे राज्य में हम कभी भी सुरक्षित नहीं रह सकते है जहाँ andher nagari chaupat raja हो . खैर कोई बात नहीं अब में आ गया हूँ अब जैसा कहूंगा वैसा ही करना .

अब गुरु ने जल्लाद से बोला कि मैं भी मोटा हूँ मुझे फांसी पर चढ़ाओ और गंगाधर भी जल्लाद से बोला मुझे फांसी पर चढ़ाओ . दोनों एक-दूसरे जल्लाद को खींच रहे थे .

इसे देखकर राजा ने सोचा कि क्या बात है फांसी का नाम सुनते ही अच्छे अच्छे के होश ठिकाने आ जाता है लेकिन तुम दोनों ऐसे करा रहे हो जैसे कोई मिठाई बंट रही है . आखिर बात क्या है , मुझे भी बताओ .

गुरुजी तो इसी बात की फ़िराक में थे। बोले राजन, आज का मुर्हुत हजार वर्षों में कुछ क्षणों के लिए आता है। इस वक्त जो फांसी चढ़ेगा उसे अगले जन्म में आपके राज्य से पांच गुना बड़ा राज्य-वैभव और यश प्राप्त होगा। राजा ने इस बात को सुनकर उनका विचार बदल गया क्योकि वह एक मूर्खाधिराज और बहुत लालची भी था .

तब राजा ने आदेश दिया इन दोनों गुरु शिष्य को छोड़कर मुझे ही फांसी पर चढ़ा दो . और उसने जल्लाद से फांसी का फंदा छीनकर अपने गले में खुद डाल लिया और फांसी पर झूल गया। और अंत में गंगाधर और गुरुजी के साथ वहां से तुरन्त चले गए। तभी से यह कहावत प्रचलित है- “अन्धेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा”

उपसंहार; – आपको इस कहानी से क्या सीख मिलती है – कि हमें मूर्खों से हमेशा दूर ही रहना चाहिए . पता नहीं कब वो हमारे जान का दुश्मन बन जाय .

 

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