महावीर स्वामी कौन थे एवं उनके जीवन पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण बातें

महावीर स्वामी (Vardhaman Mahavir) और उनका गृह त्याग





इनके घर में सुख-सुविधाओं के लिए सब कुछ उपलब्ध थे, लेकिन इनका मन इन भोग-विलासी वस्तुओं में नहीं लगता था | ऊँचे महल तथा शान ए शौकत घोड़े हांथी सब कुछ मिलकर भी उन्हें शांति नहीं दे सके | इसलिए वे शान्ति की खोज में निकल पड़े |

वास्तव में देखा जाए तो इनका जन्म दुनिया में ज्ञान बाँटने के लिए हुआ था , तो कहाँ इन सांसारिक वस्तुओं में उलझ कर रहते |

वर्धमान महावीर ने 30 बर्ष की आयु में गृह-त्याग कर दिया था | और 12 बर्ष की कठिन तपस्या के बाद ऋजुपालिका नदी के तट पर श्रम्मिक ग्राम में उन्हे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी । जिनके बाद उन्हे ‘जिन, निग्रंथ, अर्हत तथा केवलिन कहा गया ।

महावीर स्वामी और जैन धर्म की महिमा

जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार समय-समय पर धर्म को बचाए रखने के लिए प्रवर्तकों का जन्म होता है. जो सत्य धर्म की राह और आत्मिक सुख के सच्चे रह बताते है , वही तीर्थंकर कहते है | और इनकी संख्या 24 है.

  • जैन-धर्म के संस्थापक तथा प्रथम ऋषभदेव थॆ.
  • जैन-धर्म के परंपरा के अनुसार कुल 24 तीर्थकर हुए.
  • जैन-धर्म के 23 वें तीर्थकर पार्श्वनाथ थे.
  • महावीर से पहले पार्श्वनाथ ने चार जैन सिध्दांत दिए थे- सत्य, अहिंसा,अपरिग्रह तथा अस्तेय
  • महावीर ने पाँचवाँ सिध्दांत “ब्रह्मचर्य” जोडा
  • महावीर के मृत्यु के बाद जैन धर्म दो भागों में बंट गया- दिगंबर ( भद्रबाहु के समर्थक) तथा श्वेताम्बर (स्थुलभद्र के समर्थक)
  • श्वेताम्बर श्वेत वस्त्र धारन करते है, जबकि दिगंबर पंथ को मानने वाले वस्त्र का परित्याग करते है
  • जैन-धर्म के ग्रंथो की रचना प्राकृत भाषा में हुई .
  • जैन-धर्म को पुर्व या आगम कहा जाता है। और इनकी संख्या 12 है.
  • जैन-धर्म के अनुसार ‘मोक्ष’ प्राप्ति के लिये तीन तत्वो का होना अनिवार्य है- सम्यक दर्शन , सम्यक ज्ञान , सम्यक कर्म या सम्यक आचरण
  • जैन-धर्म में ईश्वर की मान्यता नही है .

महावीर स्वामी और उनके विचार

भगवान् महावीर जैन धर्म के संस्थापक थे | उनके जन्म को लेकर कई विद्वानों का अलग अलग मत है | पहले तो उनके सिद्धांत को लेकर था | क्योकि (Therefore) इनका जन्म एक क्षत्रिय परिवार में हुआ| और वे जैन-धर्म के संस्थापक कैसे बने |

लेकिन इसका उतर यह है की जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के सिद्धांत को इन्होने अध्यन किया | और उन्हें यह पता चला की इस धर्म में बहुत ही आडम्बर है |

लेकिन इनके जन्म को लेकर सभी इनका जन्म भारत देश को ही मानते है | विद्वानों के अनुसार वे महावीर स्वामी का कार्यकाल को ईराक के जराथ्रुस्ट, फिलिस्तीन के जिरेमिया, चीन के कन्फ्यूसियस तथा लाओत्से और युनान के पाइथोगोरस, प्लेटो और सुकरात के समकालीन मानते हैं|

इन्होने अपने उपदेश से देश-विदेश के कई राजाओं तथा महाराजाओं को भी प्रभावित किया था | मगध साम्रज्य के बिम्बिसार और चन्द्रगुप्त मौर्या जिन्होंने जैन-धर्म को अपनाया था | उन्होंने हिन्दू-धरम में फैले जाती-प्रथा जैसे कुरूतियों का भी बहुत विरोध किया था | और कहा की हर किसी को सम्मान अधिकार मिलनी चाहिए |

इन्होने हिंसा , जानवरों की बलि , जाट-पांत, भेद-भाव तथा छुआ-छूत का जमकर विरोध किया | उनके अनुसार ये सभी धर्म के बाहरी आडम्बर है | सभी मनुष्य एक ही परमात्मा की संतान है | इसलिए सभी मिलजुल कर रहना चाहिए | और एक-दूसरे के काम आए | परोपकार में जो आनंद आता है वो जीवन के किसी पल में नहीं है | इसलिए समाज में फैले इन कुरूतियों जैसे- झूठ, अहिंसा, छुआ-छूत , जाति पाँति का भेद भाव मिटाकर एक दूसरे के गले मिलो

ये सत्य , अहिंसा और त्याग एक मूर्ति थे , जिन्होंने दुनिया को भी सत्य और अहिंसा के राह पर चलने का सन्देश दिया | जिन्होंने उनके कहे गए आदर्श और उनके उत्तम आचरण को अपनाया ,वे आज सुखी है
ये डगर शुरू में तो थोड़ा कठिन होता है लेकिन बाद में आसान बन जाते है |

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