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नवरात्री में माँ दुर्गा की पूजा कैसे करे- Maa Durga ki mahima

मां दुर्गा के नौ रूपों की कहानी: Maa durga ke no rupo ki kahani

नवरात्रि के नव दिनों की महिमा : दुर्गा-पुजा तथा नवरात्री हिन्दुओ के लिए बहुत बडा त्योहारों में सें एक है | इस त्योहार पर प्रथम दिन में कलश के स्थापना से लेकर ये पुजा पुरे नव दिन तक चलता है ।
नवरात्री का त्योहार धर्म और आस्था का प्रतीक का त्योहार है, और इस त्योहार को हमलोग बहुत ही धुम-धाम से मनाते है। दुर्गा पूजा के नव दिनों में यानी नवरात्रि मे मां दुर्गा की पुजा बहुत ही विधि-विधान से दुर्गा मां के नौ रुपों की उपासना की जाती है ।

दुर्गा पुजा को हम नवरात्री भी कहते है, क्योकिं यह पूजा पुरे नव दिन तक चलता है, और इस पूजा में दुर्गा मां को नव दिन तक हम सभी पुजा करते है, और माता का नव दिन का अलग-अलग ही महत्व है।
दशहरा पुरे दस दिनो का पर्व है, लेकिन इसे हम नवरात्री कयों कहते है, इसके पीछे भी कोई कहानी है, आइए जानते है। वैसे तो हमारे देश में नवरात्री साल में दो बार आता है- एक बार शरद ऋतु में और दुसरी बसन्त ऋतु में शरद ऋतु के नवरात्री को हमलोग शारदीय नवरात्री तथा बसनत ऋतु में होने वाले नवरात्री को चैत्र नवरात्री कहते है, जिसे हम रामनवमी के नाम से जानते है|

पौराणिक कथा के अनुसार मां पार्वती ने भगवान शंकर से पुछा कि स्वामी ये नवरात्री त्योहार का क्या महत्व है, तब भगवान ने बहुत ही सटीक उतर दिया है।

1. शैलपुत्री

दुर्गा माता के प्रथम रुप को हम शैलपुत्री के नाम से जानते है। इनका जन्म पर्वतों के राजा हिमालय के घर हुआ था, इसलिए इनका नाम शैलपुत्री पडा। शैल का मतलब होता है- पर्वत और पुत्री यानी पर्वतों की पुत्री

महिमा :- मां दुर्गा के प्र्थम अवतार को हम शैलपुत्री के रूप में पूजते है । पर्वतो के राजा हिमालय के वहां पुत्री रत्न के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नाम शैलपुत्री पडा।

शैलपुत्री को हम वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती है, कयोकिं इनका वाहन वृषभ है और ये वृषभ पर ही आरुढ रहती है । इनके दाएं हाथ मे त्रिशुल धारण किए रहती है तथा बाएं हाथ में कमल का फ़ुल सुशोभित रहता है ।
इनके पिछे भी पौराणिक कथाएं प्र्चलित है।
एक बार की बात है, राजा दक्ष प्रजापति ने बहुत बडा यज्ञ का आयोजन किया । और उस यज्ञ में सभी देवताओ को निमंत्रन पत्र भेजा गया, और सभी देवताओ के बेठने के लिए अलग-अलग आसन की व्य्वस्था की गई।

लेकिन इस यज्ञ में भगवान शंकर को न ही निमंत्रन-पत्र भेजा गया न उनके लिए आसन की व्यस्था की गई ।
देवी सती जो भगवान शंकर की अर्धगनि थी, वे राजा दक्ष की पुत्री थी, वे अपने मायके जाने के लिए भगवान शंकर से प्रबल आग्रह करने लगी । भगवान शंकर ने उन्हे समझाया , बिना

निमंत्रन वहां जाना बेकार है, लेकिन सती अपने ह्ठ पर अटल रही । अन्त में भगवान शंकर ने उन्हे जाने की अनुमती प्रदान कर दी ।
जब सती अपने मायके पहुंची, तब उन्हे स्वागत के बदले अपनी मां से केवल स्नेह मिला और बहनों से उपहास और व्यंग्य भरे बाणो से स्वागत की ।
उनके पिता दक्ष प्रजापती ने भगवान शंकर को तिरस्कार और अपमानजनक बात कहे, जिसे सती को बहुत ठेस पहुंची, अपने पती-प्रमेशवर का इतना भारी अपमान सती ने सह न सकी और वही यज्ञ-स्थल के अग्नि-कुंड मे कुद कर अपने प्राण त्याग दिए ।

जब यह समाचार भगवान शंकर ने सुना तो वे दुख से विहवल हो गये, और फ़िर उनहोने वीरभद्र को भेजा , जिनहोने दक्ष प्रजापति के यज्ञ को विध्वंस करके उसे मिटा दिया ।
पुन: जब सती का जन्म राजा हिमालय के घर में हुई, जो शैलपुत्री कहलाई । माता शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से ही हुई। मां शैलपुत्री की शक्ति अनंत है, जिसे हम पार्वती और देवी हेमवती के नाम से भी जानते है ।

2. ब्रह्मचारिणी

 

 

 

 

 

ब्र्ह्मचारिणि मां की पुजा नवरात्री के दुसरे दिन होता है। ब्र्ह्मा का अर्थ है-तपस्या और चारिणि का अर्थ है-आचरण करने वाली, मतलब तप का आचरण करने वाली ।
मा ब्र्ह्मचारिणि पर भी पौराणिक कथाएं प्र्चलित है:- कि पुर्व जन्म में इनका जन्म हिमालय के घर पुत्री के रुप में हुई थी, और देवऋर्षि नारद के उपदेश से प्रभावित होकर भगवान शंकर को पति रुप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की । इन्होने एक हजार बर्ष तक फ़ल-फ़ुल खाकर तप्स्या की, तथा सौ बर्षों तक धरती पर शाक पर निर्वाह किया ।

बहुत दिनों तक घोर उपवास रखा तथा खुले आकाश के नीचे घोर बर्षा और धुप के कष्ट सहा । तीन हजार बर्ष तक टुटे हुए बेलपत्र के पते खाकर भी भगवान शंकर की अराधना में कोई कसर नही छोडी ।
फ़िर इन्होने सुखे बेलपत्र भी खाने छोड दिए , जिसके कारण इनका नाम अर्पणा पडा । कई ह्जार बर्षों तक निर्जल और निराहार होकर तपस्या करती रही ।
इस कठिन तपस्या से देवी का शरीर छिन्न-भिन्न हो गया और इस तपस्या को देवता, ऋर्षिगण , मुनि आदि ने इस तपस्या को बहुत सराहना की और कहा- हे देवी ऎसी तपस्या आजतक किसी ने नही की , अब आपके सारे मनोकामना पुर्ण होगी, और भगवान चन्द्र्मौली आपको पति के रुप में प्राप्त होगी ।

 

मां ब्रह्माचारिणि की पुजा जो भक्त दिल से करते है, उनकी सारे सिध्दि पुर्ण होगी, भक्त को चाहिये कि कठिन से कठिन परिसिथति में भी विचलित नही होना चाहिये, और मां के भक्ति में ध्यान लगाना चाहिये ।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

3. चंन्द्रघंटा

 

 

 

 

 

चंन्द्रघंटा मां दुर्गा के तिसरी अवतार का रुप है, जिनकी पुजा नवरात्री के तीसरे दिन कि जाती है। नवरात्रि में तीसरे दिन का पुजा बहुत खाश होता है। मां की पुजा पुरे विधि-विधान के साथ माता के नौ रुपों की पुजा-अर्चना की जाती है ।
देवी चंन्द्र्घंटा के बारे में जुडी कुछ कथाएं:-
इस देवी के प्रभाव से साधक को अलौकिक वस्तुओ के दर्शन होते है, तथा कई तरह के ध्वनियां सुनाई देती है ।
मां दुर्गा के तीसरा अवतार देवी का यह स्वरुप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है,इसलिए हम भक्तों को निरंतर उसकी पवित्रता को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए । इस देवी के मस्तिष्क पर आधा चन्द्र सुशोभित रहता है, इसलिए इस देवी को हम चंन्द्र्घंटा कहते है ।

इस देवी के ध्यान से हमारे इहलोक और परलोक दोनो के लिए कल्याणकारी तथा सदगति देने वाली है ।

या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नाम: ||

इस देवी के द्स हांथ है, जो खडग और अस्त्र और शस्त्रों से सुसजित होते है, तथा इनका शरीर का रंग सोने के समान चमकीला है। अपने वाहन सिंह पर सवार होकर युध्द के लिए हमेशा तत्पर होती है।

इनके घंटे से भयानक ध्वनि आती है, जिससे दानव-दैत्य और राक्षस कांपते हुए नजर आते है, साधक को अलौकिक वस्तुओ के दर्शन होते है, तथा कई तरह से ध्वनियों भी सुनाई पडती है । यह देवी सधको के लिए अत्यन्त कल्याणकारी है:
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

4. कूष्माण्डा (मां दुर्गा के चौथा रुप)

 

 

 

कुष्मांडा देवी की पुजा नवरात्रि के चौथे दिन को की जाती है, तथा यह चक्र साधक के लिये अदाहत में अवस्थित होता है ।
अन्य देवियों की तरह कुष्मांडा देवी की भी पुजा पुरे विधि-विधान से की जाती है । देवी कुष्मांडा पर आधारित प्रचलित कथाएँ:
मंद और हल्की हंसी के द्वारा ब्र्हाण्ड को उत्पन्न करने के कारन इस देवी का नाम कुष्मांडां नाम पडा। जब पुरे ब्र्ह्माण्ड में सृष्टि नाम की कोई चीज नही थी, केवल चारो तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा ही था।
इस परिस्थति में इस देवी ने ईषत हास्य से सम्पुर्ण ब्र्ह्माण्ड की रचना की, इसलिए इस देवी को आदिशक्ति भी कहते है ।
ये अष्ट्भुजाधारी तथा इनके सातो हाथों मे कमंडल, धनुष-वाण, कमल-पुष्प, अमृत-कलश, चक्र तथा गदा विधमान रहते है । इनके आठवें हांथ में जपमाला होती है, जो सभी सिध्दियों एवं निधियों को देनी वाली होती है ।
इस देवी का वाहन सिंह है तथा वलि के रुप में इनको कुम्ह्डा बहुत पसंद है, जिनका संस्कृत में कुष्मांडां कहते है ।
इस देवी का वासस्थान सुर्यमंडल के लोक में है । कुष्मांडां देवी की शरीर की कांति तथा प्रभा सुर्य के समान हमेशा चमकता रहता है, तथा इन्ही के तेज से दसो दिशाएं आलौकित रहती है, ब्र्ह्मण्ड में इन्ही का तेज सभी प्राणिओ में बिधमान रहता है।
कुष्मांडां देवी की पुजा हमें चंचल तथा पवित्र मन से करना चाहिये । प्रसाद के रुप में भक्तों को रोग और शोक का नाश होता है, तथा आयु, यश और बल की वृध्दि होती है ।
यह देवी भक्तों पर तुरन्त खुश हो जाती है, तथा उन्हे रोग-व्याधि से मुक्त कर धन-धान्य तथा सुख-समृध्दि से समपन्न करती है । अत: हम सबकॊ इस देवी की अर्चना जरुर करनी चाहिये ।
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे।

5. स्कंदमाता (मां दुर्गा के पांचवा रुप)

 

 

 

 

 

 

 

मां दुर्गा के पांचवां रुप को स्कंदमाता कहते है, जिनकी पुजा विधि-विधान के साथ नवरात्रि के पांचवें दिन को होता है ।
इस देवी की चार भुजाएं हैं, जो क्र्मश: स्कंद, कमल का पुष्प, वरदमुद्रा तथा कमल के पुष्प धारण किए होती है । इस देवी को ज्ञान का देवी कहा जाता है ।

यह देवी पहाडों पर रहकर सांसांरिक जीवों के लिए चेतना का निर्माण करती है, इसके आशीर्वाद से महा मुर्ख भी ज्ञानी हो जाता है । कार्तिकेय (स्कंदकुमार) के माता होने के कारन इन्हे स्कंदमाता कहते है । इनका वाहन सिंह है, तथा ये हमेशा कमल के पुष्प पर विराजमान होती है, इसलिए इसे पधासन भी कहा जाता है ।

स्कंदमाता के आशीर्वाद से आपकी मनोकामना पुर्ण होगी, मोक्ष की प्राप्ति होती है । एकाग्र मन से किया गया ध्यान से भक्त को भवसागर पार करने में कोई कठिनाई नही आती है । मां स्कंदमाता की कृपा से ही कालिदास जी ने रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत की रचना की ।
सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥

6. कात्यायनी (मां दुर्गा के छठा रुप)

 

 

 

 

 

 

 

 

दुर्गा-पुजा के छठे दिन की पुजा मां कात्यायनी के नाम से बडे ही विधि-विधान से समपन्न की जाती है । ऎसा कथा है कि कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की कठिन उपासना की, क्योकिं उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। अन्त में मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया, इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं ।
संसार में जो कार्य हो रहा है, लेकिन हमे दिखता नही है यानी सुक्ष्म है और कार्य हो रहा है, यही कार्य मां कात्यायनी करती है ।

इनके अराधना से भक्तों के अर्थ, धर्म,काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है, तथा रोग, शोक, संताप तथा भय नष्ट हो जाते है । ये माता अमोध फ़लदायिनी है ।
भगवान श्रीकृष्ण को पाने के लिए गोपियों ने इसी माता की पुजा कालिदीं यमुना के तट पर की थी । इनका वाहन सिंह है, तथा हांथ मे कमल का फ़ुल सुशोभित होता है ।

चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

7. कालरात्रि (मां दुर्गा के सातवां रुप)

 

 

 

 

 

 

नवारात्रि के सातवें दिन की पुजा मां कालरत्रि के नाम से जानते है । मां का यह रुप बहुत भयानक होता है, पुरे जगत में इससे भयानक कुछ भी नही है ।
दुर्गा मां के सांतवी शक्ति के रुप में इनको जाना जाता है । इनका शरीर का रंग काला होता है, बाल बिखरे हुए होते है, गले में एक माला होती है, जो बिधुत की तरह चमकती है ।
यह माता काल से भी रक्षा करने वाली होती है ।

कालरात्रि मां की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे अपने-आप खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके नाम सुनकर दुर से ही भाग जाते हैं।

इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

8. महागौरी (मां दुर्गा के आठवां रुप)

 

 

 

 

 

 

 

 

दुर्गा मां के आठवां रुप को महागौरी कहते है, और इनकी पुजा आठवें दिन विधि-विधान के साथ होती है। इनहे सौन्दर्य का प्रतीक कहते है ।
महागौरी माता गौर वर्ण के है। इनके सभी आभुषण और वस्त्र सफ़ेद है, इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। इनका वाहन बृषभ है। ये एक हांथ मे डमरु तथा एक हांथ मे त्रिशुल धार्ण किए होती है तथा शांत स्वभाव वाली मां है ।

पति के रूप में भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठिन तपस्या की , इसी वजह से इनका शरीर काला पड़ गया लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर पुन: कांतिमय बना दिया। उनका रूप गौर वर्ण का हो गया। इसीलिए यह महागौरी कहलाईं।

यह अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कलुष धुल जाते हैं तथा उनके पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

9. सिध्दिदात्री (मां दुर्गा के नौवां रुप)

 

 

 

 

 

 

मां सिध्दिदात्री की पुजा नवमें दिन विधि-विधान से की जाती है । यह माता संसार की सारी सिध्दियों को देने वाली होती है । भक्तगन इसके आशिर्वाद से कठिन से कठिन कार्य चुटकियों में कर डालते है ।

इस देवी के कुल आठ सिद्धियां अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व है । सच्चे मन से उपासना करके इन सिद्धियों को प्राप्त किया जा सकता है । हिमाचल के नंदापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल है।

भगवान शंकर ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। जिसे हम अर्द्धनारीश्वर के नाम से जानते है ।
इनका वाहन सिंह है, तथा ये कमल के फ़ुल पर विराजमान होती है । भक्त अगर इनकी साधना पुरे मन से करते है तो उनके लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।
सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयाात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

दोस्तो, दुर्गा-पुजा के नौ दिन इनही देवियों के नाम से जो सभी दुर्गा मां के नव अवतार है, पुजी जाती है, इन नव माताओ ने मिलकर भयानक राक्षस महिषासुर का वध नवें दिन मे किया था ।इसलिए ये दुर्गा-पुजा या नवरात्रि नव दिन चलकर दसवें को दशहरा कहते है समापन्न होता है, उन दिन हम रावण दहन करते है ।

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