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अनंत चतुर्दशी का व्रत एवं उनसे जुडी पौराणिक कथा  -Anant Chaturdashi & unse judi pauranik kathae

अनंत चतुर्दशी का त्यौहार हिन्दुधर्म में मनाते है| अनंत चतुर्दशी का त्यौहार हरसाल भाद्रमाह के शुक्लपक्ष को मनाया जाता  है | अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री अनंत देव की धूमधाम से पूजा की जाती है | अनंत चतुर्दशी में एक अनंत भगवन के नाम का मंत्रोउच्चारण करके हाँथ में धागा जिसे हम रक्षासूत्र कहते है बांधते है | ऐसा किवदंती है की भगवन श्रीआनंद देव का संकल्प लेकर हाँथ में धागा बांधने से आपके सारे संकट टल जाते है | इसी दिन हम बिघनहर्ता श्री गणेश जी का बिसर्जन करते है |

अनंत चतुर्दशी का महत्त्व

अनंत चतुर्दशी का हिन्दू धर्म में क्या महत्त्व है

What is importance of Anant Chaturdashi in Hindu religion.

अनंत चतुर्दशी का त्योहार हिन्दुओ में बहुत ही खास महत्व रखता है, उनका ऎसा मानना है कि भगवान अनंत देव की कृपा से उनके सारे सकट या विपति का अन्त हो जाएगा और उनके गृहस्थ जीवन में सुख और समृध्दि हमेशा बनी रहेगी ।

 

अनंत चतुर्दशी का व्रत भाद्र माह के चतुर्दशी के दिन को मनाया जाता है. इस दिन संकटहर्ता भगवान अनंत देव जो हरि के रुप है उनकी पुजा की जाती है । इस दिन स्त्री एवम पुरुष संकल्प लेकर अपने हांथ में एक धागा धारण करते है, जो रेशम व रुई की होती है, और उस धागे में चौदह गांठे होती है। ईस धागे को पुरुष दाएं तथा स्त्री अपने बाएं हांथ में धारन करते है।

 

अनन्त सुत्र का बहुत ही महत्व है, अनंत चतुर्दशी पर्व को करने तथा रक्षा सुत्र को बांधने से आपने जीवने में सारी विपति टल जाता है, तथा आपके जीवन सुख-समृध्दि से परिपुर्ण हो जाता है|

अगर आप तन-मन और धन से अनंत चतुर्दशी का पर्व को करते है तो इतने कष्टो का निवारण हो जाएगा:-

  • आपके गाहृस्थ जीवन में दरिद्रता पास नही फ़टकेगी,
  • आपकी मनोकामना अवश्य पुरी होगी, जो सच्चे दिल से मांगी गई हो,
  • गृहों एवम नक्षत्रों से मुक्ती मिलेगी
  • आप स्वस्थ्य तथा दुर्घटनाओं जैसे संकट से मुक्त रहेंगें
  • अनंत सुत्र आपके जीवन में रक्षा कवच का काम करेगा ।

अनंत चतुर्दशी व्रत से जुडी कुछ पौराणिक कथाएँ

महाभारत के अनुसार जब कौरवों ने छल से जुए में पांडवों को हरा दिया था, तत्पश्चत पांडवों को अपना राजपाट को त्याग कर वनवास जाना पडा था, और वहां पर उन्होंने बहुत कष्ट झेले । फ़िर एक दिन भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए, तो धर्मराज युधिष्ठर ने उनसे पुछा- हे केशव ! ईस पीडा से बाहर निकलने का और दोबारा राजपाट प्राप्त करने का क्या उपाय है । तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-आप पत्नी तथा सभी भाई-बान्धवो के साथ भाद्र मास के शुक्ल चतुर्दशी का व्रत रखें तथा भगवान श्री अनंत देव की पुजा करें ।

 

धर्मराज युधिष्ठिर के मन में अनंत देव भगवान के बारे में जानने की ईच्छा प्रकट हुई तो श्रीकृष्ण ने बताया कि अनंत देव भगवान बिष्णु का ही एक रुप है, और चतुर्मास में शेषनाग की शैय्या पर अनंत पर रहते है, जिनके आदि और अंत का कोई पता नही चलता है, इसलिए ये अनंत देव कहलाते है । इनके पुजन से आपके सारे कष्टों अन्त हो जाएगा ।

 

भगवान श्री कृष्ण के सलाह से युधिष्टिर ने अपने सपरिवार विधि-विधान के साथ नदी के किनारे भगवान श्री हरी की पुजा की तथा अनन्त सुत्र को धारण किया और इस प्रकार उन्हे वापस राजपाट प्राप्त हुआ ।

दुसरी कथा

सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि अपनी पत्नी दीक्षा के साथ रहते थे। उनकी पत्नी एक धार्मिक स्त्री थी । उनकी सुशीला नामकी एक पुत्री थी जो अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तुमुनि ने सुशीला का विवाह कौण्डिन्यमुनि से किया।

कौण्डिन्यमुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्तसूत्रबांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्तसूत्रपर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है?

शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु धन-ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने मुनि ने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और उस अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का सुत्र समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया।

इस तरह के अपमान से अनंत देव नाराज हो गए और उसके सारी संपत्ति नष्ट हो गई और उनके सारे सुख दुख में बदल गए, और अपने जीवन-यापन के लिए वन-वन भटकने पर मजबुर हो गए ।

जब कौण्डिन्य मुनि को इस गलती का एहसास हुआ तो उसने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया और अनंत भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे।

बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्य मुनि को जब अनन्त भगवान से दर्शन नहीं हुआ, तो वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण के भेष में आकर अनन्त भगवान ने उन्हें आत्महत्या करने से रोका और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुजअनन्तदेवका दर्शन कराया।
और इस प्रकार से उनेक सारे कष्ट दुर हुए ।
आप अनंत चतुर्दशी व्र्त-कथा एवं महिमा YouTube Video पर भी देख सकते है ।

अनंत चतुर्दशी व्रत कैसे करें

क्योकिं महिलाएं अनंत चतुर्दशी की पुजा अपने परिवार कि सुख और समृध्दि केलिए करती है ।

-सुबह-सुबह नित्य-क्रिया से निवृत होकर स्नान आदि करे
-मीट्ठा पकवान खीर-पुडी आदि बनवाए
-अपने घर के आंगन में कलश की स्थापना करें तथा कलश में कमल का पुष्प एवं धुर्वा घास को चढाएं

-भगवान श्रीविष्णु की प्रतिमा एवं फ़ोटो रखें, जिसमें भगवान शेषनाग पर लेटे हो,
-१४ गांठो वाला अनंतसुत्र रखें
-पुजन सामग्री में रोली, चंदन, धुप, दीप और नैवेध रखें
-धु्प एवं दीप को जलाकर अनंतदेव का आह्वन करें और ॐ अनन्तायनम: मंत्र का निरन्तर जाप करें
-फ़िर भगवान विष्णु की प्रार्थना करके उनकी पूरी कथा को श्रवन करें और अन्तमें आरती उतारें
-तत्प्श्चात ये मंत्र से संकल्प लेकर रक्षासुत्र को बांधे

अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।

अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

-फ़िर अन्त मे ब्राह्मणों को भोजन कराएं इसके बाद सपरिवार भोजन ग्रहन करें
इस प्रकार से आप अनंत चतुर्दशी का व्रत समपन्न होगें और अनंत देव प्रसन्न होगें और आपके घर को सुख और ऐश्वर्य से भर देगें ।

 

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